❤️❤️ वैसे भी ❤️❤️

आज हिंदी में लिख रही हूं। अब हिंदी में इसलिए,क्यों कि मै हिंदी में ही महसूस कर पाती हूं। अंग्रेजी में तो सोचे समझे ख्याल लिख देती हूं बस। और तुम्हे तो मै सोचने से ज्यादा महसूस करती हूं। बहुत बार सोचा कि तुम्हें कुछ लिखूं ,पर फिर डर गई कि कहीं सोशल मीडिया पर अपने प्रेमियों के लिए स्टेटस डालने वाले लोगो की तरह मुझे भी क्रिंजि ना कह दिया जाए।और ये सब सोचते- सोचते ,हर गुजरते दिन के साथ तुम्हारा एहसास कम होने लगता ,और फ़िर दिनों तक मै तुम्हें महसूस करना भूल सी जाती हूं। …………………… फिर, तुम तो जानते ही हो कि मैं सोचती बहुत हूं।

और वैसे भी क्या फ़र्क पड़ता है,प्रेमी तो हम थे नहीं।……...थे क्या??

कभी- कभी मै सोचती हूं कि ,अगर हम साथ में होते तो ,क्या मै भी सोशल मीडिया पर स्टेटस डालती तुम्हारे लिए?? शायद डाल देती ,या रुको! शायद नहीं डालती। क्यों की मुझे याद है कि पहले तुम मेरी इन हरकतों पर या तो मेरा मज़ाक बनाकर बहुत हंसते थे, या अक्सर सब जानते हुए भी मुझसे पूछते थे “कि सुनो,कौन है वो जिस पर इतना प्यार लुटा रही हो।”… फिर, इस सवाल में गलत भी क्या था????

और वैसे भी क्या फ़र्क पड़ता है, प्रेमी तो हम थे नहीं।……..थे क्या ???

दोस्त हम नहीं थे, ये तो हम दोनों ही मानते थे पर अपने साथ को लेबल देना बिल्कुल भी नहीं जानते थे। एक दूसरे को छुप छुप कर देखते भी थे ,और पकड़े जाने पर नज़रे भी चुराते भी थे। …………………… फिर ,ऐसी कौन-सी बड़ी बात हो गई????

और वैसे भी क्या फ़र्क पड़ता है, प्रेमी तो हम थे नहीं।………थे क्या??

जब भी पुराना फेसबुक अकाउंट लॉग इन करती हूं , तो तुम्हारे पुराने मेसेजेस पढ़कर आज भी मुस्कुराने लगती हूं। कहती नहीं हूं पर जानती हूं कि,अब भी तुमसे बहुत………….🥀🥀 देखो आज भी नहीं लिख पाती मै,आज भी नहीं कह पाती मै।………… फिर ,”ये” कहकर अब होता भी क्या???

और वैसे भी क्या फ़र्क पड़ता है,प्रेमी तो हम थे नहीं।………थे क्या??

पर शायद उस वक्त “ये” कहा होता, तो शायद “ये” सब कहीं खत्म भी हुआ होता। और क्या पता अगर “ये” खत्म हुआ होता तो,मेरा सफर भी कुछ आगे बढ़ा होता,शिकायतें होती मगर कम से कम तुम्हारा यूं इंतज़ार तो नहीं होता।…………………………. फिर ,ये इंतज़ार हो भी क्यों???

और वैसे भी क्या फ़र्क पड़ता है, प्रेमी तो हम थे नहीं।………थे क्या??

मुझे अच्छे से याद है,जब जाते वक़्त तुमने मेरे कान में कहा था “कि सुनो लौटकर तुमसे दिल की कुछ बात करनी हैं।” उस वक़्त मैंने भी बस हां में सर हिलाया था। कहने सुनने का तो वक़्त बहुत था तब भी…….पर जाने क्यों गला सूख गया था तब मेरा, जब मेरे आंसुओ से कंधा भीग रहा था तुम्हारा।

और देखो आज ज़रा,ना तो तुम ही कभी लौटे वहां अपने दिल की बात बताने,और ना ही मै वापस गई वहां तुम्हारी बातों को सुनने।…………………….. फिर ,हम वहां जाते भी क्यों???

और वैसे भी क्या फ़र्क पड़ता है,प्रेमी तो हम थे नहीं……….थे क्या??

तुम सोच रहे होगे कि आज इतने समय बाद,आखिर मै तुम्हे ये लिख क्यों रही हूं।तो सुनो!मै नहीं जानती कि हम, प्रेमी थे या नहीं…… “पर सच कहूं तो दुनिया कि इस भीड़ में मुझे अब भी तुम्हारी याद आती है,पर पहले की तरह ही मुस्कुराकर टाल देती हूं जब भी कहीं तुम्हारी बात आती है।” 🌹🌹🌹🌹🌹

तुम्हारी अपनी…..

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